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बाहर का रंग अंदर के रंग का प्रतीक है। जब सारी प्रकृति रंग से सराबोर हो जाती है तो मनुष्य भी आनन्द से झूमने लगता है होली पर्व इसी का प्रतीक है। इस रंगीन उत्सव के समय पूरा वातावरण खुशनुमा हो जाता है। प्रकृति की सुन्दरता भी मनमोहक होती है।
जिस तरह मुसलमानों के लिए ईद का त्यौहार, ईसाईयों के लिए क्रिसमस का त्यौहार जो महत्व रखता हैं उसी तरह हिन्दुओं के लिए भी होली के त्यौहार का बहुत महत्व होता है। होली का पर्व सबसे ज्यादा खुशियाँ लेकर आता है क्योंकि इस दिन हम सबसे ज्यादा हंसते हैं। लोगों के रंग से लिपे-पुते चेहरों को देखकर सभी हंसने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
होली का त्यौहार अब इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि यह त्यौहार केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय होता जा रहा है। भारत के अतिरिक्त बहुत से देशों में अब लोग होली का त्यौहार मनाने लगे हैं।
यतार्थ उद्देश्य : होली के इस त्यौहार को होलिकोत्सव भी कहा जाता है। होलिका शब्द से ही होली बना है। होलिका शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के होल्क शब्द से हुई है जिसका शाब्दिक अर्थ भुना हुआ अन्न होता है।
प्राचीनकाल में जब किसान अपनी नई फसल काटता था तो सबसे पहले देवता को भोग लगाया जाता था इसलिए नवान्न को अग्नि को समर्पित कर भूना जाता था। उस भुने हुए अन्न को सब लोग परस्पर मिलकर खाते थे। इसी ख़ुशी में नवान्न का भोग लगाने के लिए उत्सव मनाया जाता था। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इस परम्परा से होलिकोत्सव मनाया जाता है।
रंगों में परिवर्तित भगवान श्री कृष्ण से पहले यह पर्व सिर्फ होलिका दहन करके मनाया जाता था जिसमें नवान्न अर्पित किये जाते थे। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने इसे रंगों के त्योहार में परिवर्तित कर दिया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना राक्षसी का वध किया था जो होलिकोत्सव के अवसर पर उनके घर आई थी। बाद में उन्होंने इस त्यौहार को गोप-गोपिकाओं के साथ रासलीला और रंग खेलने के उत्सव के रूप में मनाया। तभी से इस त्यौहार पर दिन में रंग खेलने और रात्रि में होली जलाने की परम्परा बन गई थी।
बसंत का आगमन : बसंत में जब प्रकृति के अंग-अंग में यौवन फूट पड़ता है तो होली का त्योहार उसका श्रंगार करने आता है। होली एक ऋतू संबंधी त्यौहार है। शीतकाल की समाप्ति और ग्रीष्मकाल के आरम्भ इन दोनों ऋतुओं को मिलाने वाले संधि काल का पर्व ही होली कहलाता है। शीतकाल की समाप्ति पर किसान लोग आनन्द विभोर हो उठते हैं।
• उनका पूरी साल भर का किया गया कठोर परिश्रम सफल हो उठता है और उनकी फसल पकनी शुरू हो जाती है।
के ऐतिहासिकता होली के उत्सव के पीछे एक रोचक कहानी है जिसका काफी महत्व है। पुरातन काल में राजा हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका के अहंकार और हिरण्यकश्यप के पुत्र बालक प्रह्लाद की भक्ति से ही इस उत्सव की शुरुआत हुई थी। हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा द्वारा वरदान स्वरूप बहुत सी शक्तियाँ प्राप्त हुई थीं जिनके बल पर वह अपनी प्रजा का राजा बन बैठा था। कहा जाता है कि भक्त प्रहलाद भगवान विष्णु का नाम लेता था। प्रहलाद का पिता हिरण्यकश्यप ईश्वर को नहीं मानता था। प्रहलाद का पिता उसे ईश्वर का नाम लेने से रोकता था क्योंकि वह खुद को भगवान समझता था। वह चाहता था कि सभी लोग उसकी भक्ति और पूजा करें। प्रहलाद इस बात
को किसी भी रूप से स्वीकार नहीं कर रहा
अपनी प्रजा के साथ-साथ वो अपने पुत्र पर भी अत्याचार करता था। प्रहलाद को अनेक दंड दिए गये लेकिन भगवान की कृपा होने की वजह से ये सभी दंड विफल हो गए। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि जला नहीं सकती थी।
होलिका अपने भाई के आदेश पर प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठ गयी। भगवान की महिमा की वजह से होलिका उस चिता में चलकर राख हो गयी, लेकिन प्रहलाद
को कुछ नहीं हुआ था। इसी वजह से इस दिन होलिका दहन भी किया जाता है। क्योंकि इस दिन हिरण्यकश्यप की अहंकारी बहन होलिका की मृत्यु हुई थी।
होली का उत्सव होली की तैयारियां कई दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं। होली से पहली रात को होलिका दहन किया जाता है जिस पर घमंड और हर तरह की नकारात्मक प्रवृति का आहुति स्वरूप दहन किया जाता है। उसके फेरे लगाकर मंगलकामना की जाती है और राख से तिलक लगाया जाता है।
पौराणिक कथा को याद कर नकारात्मकता को त्याग कर सकारात्मक प्रवृति को अपनाय जाता है। होलिका दहन से अगली सुबह फूलों के रंगों से खेलते हुए होली शुभारम्भ किया
जाता है। होली के दिन को सगे-संबंधियों, परिवार मित्रों और पड़ोसियों के साथ मिलकर मनाते हैं। होली को सभी लोग
रंग-बिरंगे गुलाल और पानी में रंगों को घोलकर पिचकारियों से एक दुसरे के उपर रंग डालकर प्रेम से खेलते हैं।
से नाचते-गाते छोटे-बड़े सभी लोग इस त्योहार को खुशी के साथ मनाते हैं। शाम के समय नए वस्त्र पहनकर एक-दूसरे से मिलते हैं। छोटे बच्चे बड़ों को उनके पैरों में गुलाल डालकर प्रणाम करते हैं और बड़े छोटों को गुलाल से टिका लगाकर आशीर्वाद देते हैं। सभी लोग अपने प्रियजनों के घर जाकर पकवान खाते हैं और बधाईयाँ देते हैं। बहुत से लोग एक-दुसरे को उपहार भी देते हैं। चारों दिशाएं खुशियों से सराबोर हो जाती है।
होली गनाने की विधि होली दो दिन का त्यौहार होता है। होली के दिन एक झंडा या कोई बड़ी डंडी को गाडा जाता है। इस झंडे को किसी सार्वजनिक स्थान पर गाडा जाता है। इस डंडे को पूजा कर होली की मुहूर्त के समय इस इंडे को निकालकर इसके चारों तरफ लकड़ियाँ और उपले इकट्ठे किए जाते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार पूजा के बाद इन लकड़ियों में • आग लगाई जाती है। इसे होलिका दहन का प्रतीक माना जाता है।
अनाज इस आग में किसान अपने अपने खेत के पहले के कुछ दानों को सेकते हैं और सब में बांटते हैं। इसी से मिलन और भाईचारे की भावना जागृत होती है। दूसरे दिन दोपहर तक • पूर्ण आनन्द के साथ होली खेली जाती है। इस दिन को धुलेंडी भी कहा जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर रंग गुलाल अबीर डालते हैं।
होली के त्योहार को मनाने के लिए इस दिन i के स्कूल कॉलेज और दफ्तरों में सरकारी छुट्टी होती है। होली दिन घरों में उत्साह और खुशी का माहौल होता है। प्रत्येक व्यक्ति भेदभाव से मुक्त होली खेलता है। होली का पर्व •साल का एक यादगार पर्व बन जाता है।
होता होली का महत्व होली के दिन का हिन्दुओं में बहुत महत्व है। होली का त्यौहार दुश्मनों को भी दोस्त बना देता है। अमीर-गरीब, क्षेत्र, जाति, धर्म का कोई भेद नहीं रहता है। इस दिन लोग एक-दूसरे के जाते हैं और रंगों के साथ खेलते हैं। दूर वाले दोस्त भी इस बहाने से मिल जाते हैं। इस दिन सभी लोग अपनी नाराजगी, गम नफरत को कर एक-दूसरे के साथ एक गया रिश्ता हैं। समाज में बेहतर गठन के लिए होली ही महत्वपूर्ण भूमिका है। होली का अपने साथ बहुत से संदेश लाता है। त्योहार हमें भेदभाव और बुराईयों से सलाह देता है। घर रहने और भुला बनाते की बहुत त्यौहार होली का दूर रहने की
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